अनुच्छेद 102(1)(a) एवं 191(1)(a) में लाभ के पद के आधार पर निरर्हताओं का उल्लेख है, किंतु लाभ के पद को न तो संविधान में परिभाषित किया गया है और न ही जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम में.
प्रद्युत बारदोलाई बनाम स्वप्न रॉय वाद (2001) में उच्चतम न्यायालय ने लाभ के पद की जांच के लिए निम्नलिखित प्रश्नों को रेखांकित किया:
कालांतर में, जया बच्चन बनाम भारत संघ वाद में उच्चतम न्यायालय ने इसे अग्रलिखित प्रकार से परिभाषित किया- “ऐसा पद जो कोई लाभ अथवा मौद्रिक अनुलाभ प्रदान करने में सक्षम हो.” इस प्रकार “लाभ के पद” वाले मामले में लाभ का वास्तव में “प्राप्त होना” नहीं अपितु लाभ ‘प्राप्ति की संभावना’ एक निर्णायक कारक है.
शक्ति-पृथक्करण के विरुद्ध: लाभ का पद धारण करके कोई विधायक, कार्यपालिका (जिनका वह भाग बन गया है) से स्वतंत्र होकर अपने कार्यो का निर्वहन नहीं कर सकता.
संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना: संसदीय सचिवों के पद अथवा ऐसे ही अन्य पदों का प्रयोग राज्य सरकारों द्वारा संविधान द्वारा निर्धारित मंत्रियों की अधिकतम 15% (दिल्ली के मामले में 10%) की सीमा से बचने के साधन के रूप में किया जाता है.
संरक्षण के माध्यम से शक्ति का प्रयोग: संसदीय सचिव सरकारों की उच्च-स्तरीय बैठकों में भागीदारी करते हैं. साथ ही उनकी मंत्रियों व मंत्रालयों की फाइलों तक पहुँच हर समय बनी रहती है तथा यह पहुँच उन्हें संरक्षण के माध्यम (way of patronage) से शक्ति का प्रयोग करने में सक्षम बनाती है.
राजनीतिक समर्थन जुटाने के लिए तथा गठबंधन की राजनीति के दौर में मंत्री पदों के विकल्प के रूप में भी इन पदों का दुरूपयोग किया जाता है.
जनहित के लिए खतरा: मंत्रियों के विपरीत संसदीय सचियों को गोपनीयता की शपथ (अनुच्छेद 239 AA(4)) नहीं दिलाई जाती. तथापि उन्हें उन सूचनाओं की जानकारी हो सकती है जिनका प्रकटीकरण जनहित के लिए हानिकारक हो, भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे सकता हो और यहाँ तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष भी खतरा उत्पन्न कर सकता हो.
लाभ के पद से संबंधित अन्य मुद्दों में विधियों में संशोधन के माध्यम से विधायी शक्ति का स्वेच्छाचारी उपयोग, बड़े आकार के मंत्रिमंडल के कारण सार्वजनिक धन का दुरूपयोग तथा संशोधन की शक्ति के स्वेच्छाचारी प्रयोग के माध्यम से राजनीतिक अवसरवादिता सम्मिलित हैं. साथ ही विभिन्न राज्यों में इनकी भिन्न-भिन्न प्रस्थिति भी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है.